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योगस्थः कुरु कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय । सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥२.४८ ॥

अगर हम योग की वास्तविकता की ओर ध्यान करें तो पाएंगे की यह तन, मन, और आत्मा का सम्मिलन है। योग वह परिस्थिति है जहाँ आप जो सोचते हैं, आप जो करते हैं और आप जो भोगते हैं सब संयुक्तता को आभाषित करते हैं। सब कुछ एक, दूजा कुछ भी नहीं।

यहाँ भगवान् कृष्ण योगस्थ कर्म के संपादन का रहश्य अर्जुन से बता रहे हैं। वे कहते हैं कि "आप अपने कर्म का निष्पादन ऐसे करो जिसमे लेशमात्र भी आसक्ति न रहे और कर्म का फल सिद्ध असिद्ध इससे आप उस समानता और सामान्यता से लो ताकि आप को कोई फ़र्क़ न पड़े।

कल "कौन बनेगा करोड़पति" में देख रहा था की कैसे एक प्रतियोगी योगेश शर्मा जो पिछली बार इसी शो पर न आने के वजह से सामाजिक प्रताड़ना को झेला, अपने आप को हमेशा नकारात्मक सोचों से दूर रखा, एक चपराशी की नौकरी करते हुए तयारी जारी राखी और २५ लाख जीतकर भी गए। उनके तन, मन और ह्रदय किन किन व्यथाओं और बिचारों से संघर्ष की होगी आप सिर्फ इसका अंदाजा ही लगा सकते हैं। लेकिन जीत मिली और भगवान् कृष्ण जब योगस्थ कर्म संपादन की बात करते हैं तो वो शायद योगेश शर्मा जैसे लोगों की ही बात करते हैं। वो यही बात मुझसे और आपसे भी कहते हैं - एक बार सुन तो लीजिये
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा
श्र्ध्धा भक्ति बढाओ संतन की सेवा,...
तन मन धन, सब है तेरा, सब कूछ है तेरा
तेरा तुझको अर्पण क्या लगे मेरा...
ૐ जय श्री कृष्ण हरे

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