श्रीगणेश पूजा १०१

मानव जीवन का चरम लक्ष्य देवत्व की प्राप्ति और श्रीगणेश की सर्वप्रथम पूजा से सारे विघ्न अपने आप धराशायी हो जाते हैं। आप यहाँ गणेश पूजा की सबसे प्रामाणिक और विस्तृत व्याख्या पढ़कर और विघ्नहर्ता श्रीगणेश के आशीर्वाद से अपने जीवन के लक्ष्यों की सिद्धी करें यही हमारी उपेक्षा है।

गणेश पूजा के लिए चतुर्थी तिथी सर्वोत्कृष्ट है ऐसा स्वयं ब्रह्मा जी ने कहा है “चतुर्थ्या महिमानं नो न शक्यं सुनिरुपितुम।।(गणेश पुराण २/८२/३४) अर्थात, इस चतुर्थी-व्रत का निरूपण एवं माहात्म्य-गान शक्य नहीं।”

शिवपुराण के अनुसार जब भगवान् शिव के अमोघ त्रिशूल से पार्वतीनन्दन का मस्तक कट गया तो माँ पार्वती अत्यंत क्रोधित हो गयीं और अपने शक्तियों को संसार में प्रलय मचाने की आज्ञा दे दी। हर तरफ तबाही का माहौल बन गया। तभी सारे देवताओं ने मिलकर उत्तर दिशा से हाथी का सर लाकर धड़ से जोड़ दिया।

पुत्र को जिन्दा देख माता पार्वती शांत और अत्यंत प्रसन्न हो गयीं। ब्रह्मा,विष्णु और महेश ने वहीँ बाल गणेश को “सर्वाध्यक्ष” घोषित कर दिया।
महेश्वर शिव के तेज से शिव-पुत्र पुनः जीवित हो गए। अपने पुत्र को जीवित देख देवाधिदेव महादेव भी अत्यंत प्रसन्न हुए और अपने पुत्र को अनेकों वर प्रदान करते हुए कहा “विघ्ननाश के कार्य में तेरा नाम सर्वश्रेष्ठ होगा। तू सबका पूज्य है और अब तू मेरे सारे गानों का अध्यक्ष हो जा। ” तबसे, उनका नाम गणाध्यक्ष पर गया।

मुद्गलपुराण के अनुसार परम पराक्रमी राक्षस लोभासुर से त्रस्त होकर देवताओं ने गजानन से लोभासुर का विनाश कर उनके रक्षा करने के लिए प्रार्थना की। गजानन गणेश चतुर्थी तिथि के मध्यान्हकाल में अवतरित होकर लोभासुर का विनाश किया, इसलिए चतुर्थी तिथि देवताओं के लिए भी अत्यंत प्रीतिदायक बन गयी।

श्री गणेश के सर्वप्रिय एवं परम पावन और पुण्य चतुर्थी तिथि की उत्पत्ति का मुद्गलपुराण में व्याख्या कुछ इस तरह से है — लोकपितामह ब्रह्माजी ने सृष्टि रचना के पश्चात ह्रदय में गणेश जी का ध्यान किया। उसी समय उनके शरीर से परा, प्रकृति, महामाया तिथियों की जननी कामरुपिणि देवी प्रकट हुईं। उस देवी ने ब्रह्मा जी के चरणों में अत्यंत नम्र निवेदन किया “मैं आपके शुभ अंगों से उत्पन्न हुई हूँ। इसलिए, मैं आपकी पुत्री हूँ। आप मुझे रहने के लिए स्थान, भोजन के लिए भोग्य प्रदार्थ और मुझे बताएं की मैं क्या करूँ?”

ब्रह्मा जी ने फिर से गणेश का स्मरण किया फिर उन्होंने उस देवी को गणेश का षडक्षर मन्त्र “वक्रतुण्डाय हुम्” देते हुए कहा की तुम अद्भुत सृष्टि करो।
वह देवी श्रीगणेश जी का उग्र तप और स्तवनकरने लगीं। उनकी तपश्या से प्रकट होकर गणेश जी प्रकट हुए और कहा “हे देवी! मैं तुम्हारे निराहार तप और स्तवन से अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम मनवांछित फल माँगों।”

उस देवी ने श्रीगणेश जी के चरणों में प्रणाम कर नम्र निवेदन किया “हे करुनानिधान! आप मुझे अपनी सुदृढ़ भक्ति प्रदान करें। मुझे सृष्टि सृजन की शक्ति प्राप्त हो। मैं आपके सदा प्रिय रहूँ। और मुझसे आपका कभी वियोग न हो। ”

प्रसन्नचित श्रीगणेश ने उस देवी को वर दिया — “हे देवी! तुम मुझे सदा प्रिय रहोगी। तुम समस्त तिथियों की माता होगी। तुम्हारा नाम चतुर्थी होगा। तुम मेरी जन्मतिथि होओगी। तुम्हारे में व्रत करनेवाले का मैं विशेष रूप से पालन करूँगा और इस व्रत के सामान अन्य कोई व्रत नहीं होगा क्योंकि यह तिथि चतुर्विध फलप्रदायक होगा।”

भाद्रशुक्ल चतुर्थी, चंद्रवार के मध्यान्हकाल में जब स्वाति नक्षत्र था और पांच शुभ गृह एकत्र थे तभी जगज्जननी पार्वती ने श्रीगणेश जी को जन्म दिया था। इस कारण भाद्रपद के चतुर्थी तिथि को भगवान् गणेश के मृण्मयी मूर्ति की श्रद्धा पूर्वक पूजा, स्मरण, चिंतन, नाम जप, आरती, इत्यादि का अमित माहात्म्य है।

यह लेख मेरे तरफ से एक प्रयास है की लोगों तक प्रथमपूज्य जननायक गजानन श्रीगणेश की पूजन सम्बन्धी जानकारी को एक समग्रता से प्रस्तुत कर सकूं जिससे आप चतुर्थी व्रत का संपादन सही तरीके से कर सकें। मेरी पूरी कोशिश रहेगी की मैं आप तक शास्त्रोक्त विधि ही प्रस्तुत करूँ जिससे आप एक आनंदमय पूजा अर्चना कर सकें और श्रीगणेश की असीम कृपा से आपको मनवांछित फल की प्राप्ति हो।

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