
वो मिला उस दिन जब में था गली से गुजर रहा
मृत्यु के आगोश का जैसे इंतज़ार वो था कर रहा
देखकर उसके शुकुने सेहत पल भर को मैं दम्भित हुआ
मृत्रुभय से आखिरी ये शख्स क्यों नहीं डर रहा
मैंने झंझोरा उसे टोका उसे इस ख्याल में
देखूं भला क्या बात है इस रहस्यमय इंसान में
उसने कहा मैंने जीवन भर खुद दर्द का प्याला पिया
हरेक के आंसुओं को समेट अपने मधुशाला में लिया
चैनो शुकून जो बाँटें लोगों में आज वह मुझको मिला
मैं तो बस जीता रहा मैं तो बस जीता रहा
मन की उत्सुकता बढ़ी आँखे पल भर को अचंभित हुआ
उसने कहा मैं धनवान हूँ प्रेम और विश्वास के माल से
सोने चांदी को छोड़ चुन ली सौहार्दता के साथ की
मंदिर की प्रसाद भी बाँट दी कुछ भूखे पेट को
जो रातभर सो न सके थे दो मुट्ठी अनाज को
मेरी नज़रें गड़ चुकी थी उसके होंठ पर
जहाँ लोग जप ताप और मंदिरों के लेते रहे फेरे
मैंने दया और दान देकर पुण्य बटोरे बड़े
हाथ मेरे खाली हैं पर मन मेरा परिपूर्ण है
सब कुछ लुटाकर जिंदगी आज मेरी धन्य है
सब कुछ लुटाकर जिंदगी आज मेरी धन्य है.
कल तक जो मेरे लिए बेकार और भिखार था
एक पल में मानवता और महानता का मन्त्र था
दिल ने कहा क्या जिंदगी इससे भी बेहतर कुछ और है
सबका रहे सबके संग जिए इससे बड़ा क्या हश्र है
सबका रहे सबके संग जिए इससे बड़ा क्या हश्र है .
ईश्वर झा



September 21st, 2011
IshwarJha
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